जमाअत के मर्कज़ी तालीमी बोर्ड ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले का किया स्वागत 

बोर्ड के सेक्रेटरी सैयद तनवीर अहमद ने कहा कि हाईकोर्ट के इस फ़ैसले का अल्पसंख्यक शिक्षा पर दूरगामी असर होगा

नई दिल्ली,(एशियन पत्रिका/अनवार अहमद नूर)
जमाअत-ए-इस्लामी हिंद के मर्कज़ी तालीमी बोर्ड ने इलाहाबाद हाई कोर्ट (लखनऊ बेंच) के 16 जनवरी, 2026 के हालिया फैसले का स्वागत किया जिसमें अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान के संवैधानिक अधिकारों को बरकरार रखा गया है। साथ ही उत्तर प्रदेश में गैर-मान्यता प्राप्त मदरसों के काम करने के बारे में कानूनी स्थिति को भी स्पष्ट कर गया।
फ़ैसले के प्रसंग से जमाअत-ए-इस्लामी हिंद के मर्कज़ी तालीमी बोर्ड के सेक्रेटरी सैयद तनवीर अहमद ने कहा कि हाईकोर्ट के इस फ़ैसले का अल्पसंख्यक शिक्षा पर दूरगामी असर होगा। उन्होंने कहा कि यह फ़ैसला भारत के संविधान के अनुच्छेद 30 की आत्मा को सुदृढ़ करता है, जो धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यक को अपनी शैक्षिक संस्था स्थापित करने और प्रबंधन का अधिकार देता है। उन्होंने देश भर के मदरसों के व्यवस्थापकों को भी अपनी शुभकामनाएं दीं।
माननीय अदालत ने एक ऐसे सरकारी आदेश को रद्द कर दिया है जिसमें एक गैर-मान्यता प्राप्त मदरसे को बंद करने और सील करने का आदेश दिया गया था। अदालत ने साफ़ किया कि ऐसा कोई कानूनी नियम नहीं है जो संबंधित अधिकारियों को सिर्फ़ मंज़ूरी न मिलने के आधार पर मदरसे को बंद करने का अधिकार देता हो। कोर्ट ने साफ़ तौर पर कहा कि जो अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान सरकारी मदद या औपचारिकताओं को पूरी नहीं करते हैं, वे संविधान के आर्टिकल 30(1) के तहत सुरक्षा के हकदार हैं। हालांकि, अदालत ने यह भी साफ़ किया कि गैर-मान्यता प्राप्त संस्था सरकारी अनुदान के हकदार नहीं हैं और ऐसी संस्था में पढ़ने वाले छात्र बोर्ड एग्जाम या दूसरी सरकारी सुविधाओं के लिए तब तक योग्य नहीं होंगे जब तक संस्था को औपचारिक अनुमोदन नहीं मिल जाता।
यह फ़ैसला संवैधानिक सुरक्षा उपायों और नियामक ज़रूरतों के बीच संतुलित दृष्टिकोण पेश करता है। अदालत ने इस बात पर ज़ोर दिया कि किसी शैक्षणिक संस्थान को बंद करने जैसे प्रशासनिक कार्रवाई को स्पष्ट कानूनी अधिकार के बिना सही नहीं ठहराया जा सकता, साथ ही मान्यता प्राप्त संस्था के स्तर को बनाए रखने में राज्य के हितों को भी स्वीकार किया गया है।

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