बिना मान्यता पर मदरसा बंद करना कानूनन ग़लत है : इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश
अदालत ने सरकारी विभागों द्वारा मदरसों पर की गई कार्रवाई को कहा ग़लत

नई दिल्ली (अनवार अहमद नूर)
मदरसों के नाम से चिढ़ जाने वाले और अनेकानेक आरोपों को मदरसों पर गढ़ने वाले लोगों को उस वक्त करारा झटका लगा जब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सरकारी विभागों द्वारा मदरसों पर की गई कार्रवाई को ग़लत बताते हुए कहा कि बिना मान्यता पर भी मदरसा बंद करना कानूनन गलत है। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने श्रावस्ती के सी-एम मदरसा अहले सुन्नत इमाम अहमद रज़ा को बंद करने का आदेश रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि केवल मान्यता न होने के आधार पर मदरसा बंद नहीं किया जा सकता, अदालत ने मदरसे पर लगाई गई सील को 24 घंटे के भीतर हटाने के भी निर्देश दिए हैं।
ज्ञात रहे कि श्रावस्ती ज़िला प्रशासन ने मदरसा अहले सुन्नत इमाम अहमद रज़ा को यह कहते हुए सील कर दिया था कि इसके पास वैध मान्यता नहीं है। इस प्रशासनिक कार्रवाई के ख़िलाफ़, मदरसा कमेटी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। जिस पर न्यायालय ने कहा है कि राज्य केवल मान्यता प्राप्त मदरसों को नियंत्रित कर सकता है और बिना मान्यता वाले मदरसों पर जबरन बंद या दंडात्मक कार्रवाई करना असंवैधानिक होगा। यह फ़ैसला आने पर जहां मदरसों के संचालकों में खुशी है वहीं यह अल्पसंख्यक समुदायों की धार्मिक और शैक्षिक स्वतंत्रता को मज़बूत करता है। मुस्लिम संस्थाओं ने भी इस फ़ैसले पर खुशी जताई है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ बेंच) के न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी की पीठ ने स्पष्ट कर दिया है कि केवल ‘मान्यता’ (Recognition) न होना, किसी शैक्षणिक संस्थान को सील करने का आधार नहीं हो सकता। अदालत ने पाया कि प्रशासन ने मदरसा सील करने से पहले संचालकों को अपना पक्ष रखने का उचित अवसर नहीं दिया, जो किसी को भी बिना सुने दंडित नहीं किया जा सकता के प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के सीधे तौर पर ख़िलाफ़ है। न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी ने प्रशासन को स्पष्ट और त्वरित निर्देश देते हुए आदेश दिया कि 24 घंटे के भीतर मदरसे की सील खोली जाए और पठन-पाठन सुनिश्चित किया जाए। कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी जोड़ा कि नियमों के उल्लंघन पर जुर्माना लगाया जा सकता है या अन्य कानूनी कार्रवाई की जा सकती है, लेकिन बच्चों की शिक्षा रोकना या संस्थान को बंद करना इसका समाधान नहीं है।
अदालत का यह आदेश नवंबर 2024 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए उस फैसले की भावना के भी अनुरूप है, जिसमें इलाहाबाद हाईकोर्ट के पहले के आदेश (जिसमें यूपी मदरसा बोर्ड एक्ट 2004 को असंवैधानिक बताया गया था) को पलटते हुए ‘उत्तर प्रदेश मदरसा बोर्ड एक्ट 2004’ की संवैधानिकता को बहाल किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने भी छात्रों के भविष्य और शिक्षा के अधिकार को सर्वोपरि रखा था और अब न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से कहा कि मदरसा संचालित करने के लिए सरकारी मान्यता अनिवार्य नहीं है, खासतौर पर तब जब वह न तो राज्य सरकार से किसी प्रकार की सहायता (ग्रांट) प्राप्त कर रहा हो और न ही मान्यता की मांग कर रहा हो। ऐसे शैक्षणिक संस्थान भारत के संविधान के अनुच्छेद 30(1) के अंतर्गत संरक्षित हैं।
भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को कोई भी पेशा, व्यापार या कारोबार चलाने का अधिकार देता है। शिक्षा देना भी इसी अधिकार का हिस्सा है। कोर्ट के रुख से स्पष्ट है कि यह एक पवित्र कार्य है और इसे केवल तकनीकी आधार पर बाधित नहीं किया जा सकता।
यह फैसला उन सभी शैक्षणिक और गैर-लाभकारी संस्थानों के लिए एक महत्वपूर्ण नजीर (Precedent) है, जिन्हें प्रशासनिक कठोरता या तकनीकी खामियों के आधार पर बंद करने की कोशिश की जाती है। यह दर्शाता है कि न्यायपालिका हमेशा शिक्षा के अधिकार और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत को नौकरशाही की कठोरता पर प्राथमिकता देती है। यह निर्णय भारत में शिक्षा क्षेत्र में एक संतुलित दृष्टिकोण को बढ़ावा देता है, जहां नियामक ढांचे का पालन महत्वपूर्ण है, लेकिन छात्रों के भविष्य को दांव पर लगाना स्वीकार्य नहीं है।







