अमेरिका की अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति के शिकंजे में फंसते दुनिया के देश, अगला नंबर किसका-?
एक के बाद एक देशों पर हमला होना अमेरिकी हितों और साम्राज्य को बढ़ाना है


वेनेजुएला में अमेरिका द्वारा सैन्य कार्रवाई और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को पकड़ना जहां एक तरफ अंतरराष्ट्रीय कानूनों का गंभीर उल्लंघन है, वहीं दूसरी तरफ वेनेजुएला की संप्रभुता पर आक्रमण भी है।
नई दिल्ली (अनवार अहमद नूर की क़लम से)
एक देश वेनेज़ुएला पर अचानक रात के अंधेरे में अमेरिका द्वारा हमला करके उसके राष्ट्रपति और उनकी पत्नी को जबरन पकड़ कर ले जाया गया और सारी दुनिया देखती रह गई। उसके बाद पूरी दुनिया के सामने भला बनने और प्रेस कॉन्फ्रेंस करके वेनेज़ुएला पर अनेक बड़े अपराधों का दोष मढ़ देना बिल्कुल भी उचित नहीं है। अमेरिका के कई अंध मित्रों ने ताली बजाई, उचित बताया,बधाई दी। आख़िर इस दादागिरी के आगे मुंह खोलना सबके बस की बात नहीं होती। लेकिन कुछ देशों ने इस हमले का कड़ा विरोध किया है और कहा है कि ये तानाशाही है। किसी के घर में अचानक घुसकर हमला करके तबाही मचाना किसी को बंदी बना लेना वाकई अंतरराष्ट्रीय गुंडागर्दी है।
वेनेजुएला में अमेरिका द्वारा सैन्य कार्रवाई और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को पकड़ना जहां एक तरफ अंतरराष्ट्रीय कानूनों का गंभीर उल्लंघन है
वहीं दूसरी तरफ वेनेजुएला की संप्रभुता पर आक्रमण भी है। अगर हम बात करें संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 2(4) की तो वह कहता है कि सभी सदस्य देशों को अपने अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में किसी अन्य देश की क्षेत्रीय अखंडता या राजनीतिक स्वतंत्रता के ख़िलाफ़ बल के प्रयोग या बल की धमकी से बचना चाहिए, जिसका उद्देश्य द्वितीय विश्व युद्ध जैसी तबाही को रोकना और राज्यों की संप्रभुता का सम्मान करना है। अमेरिका की सैन्य कार्रवाई ताक़त को कानून से ऊपर मानने का प्रमाण है जिसका किसी भी रूप में समर्थन नहीं किया जा सकता।
आइए अब आपको बताएं कि दुनिया को लोकतंत्र का पाठ पढ़ाने की आड़ में क्या क्या खेल दुनिया भर में खेला जाता है।
वेनेजुएला पर हमला कोई अचानक एक मामला नहीं है इसके पीछे पूरी सोची समझी कूटनीति है। जिसको अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने बयान में स्पष्ट भी किया है, उन्होंने कहा कि वेनेजुएला में तेल और ऊर्जा के बड़े संसाधन हैं। यह ऊर्जा अमेरिका के लिए भी ज़रूरी है और पूरी दुनिया के लिए भी। इसलिए अमेरिका चाहता है कि इन संसाधनों को सुरक्षित रखा जाए।
अमेरिका अपनी अंतराष्ट्रीय कूटनीति के पांव हमेशा फैलाता रहा है। वह ईरान तक को अपनी शक्ति के बल पर नहीं बल्कि कूटनीति से हथियाना चाहता है। अमेरिका खूब जानता है कि सीधे ईरान से टकराव आसान नहीं है, इसलिए वेनेजुएला,सीरिया,लेबनान और फिर निशाना तेहरान। अगर असली उद्देश्य कहा जाए तो तेल, डॉलर और इज़राइल की सुरक्षा ही बनता है।
दुनिया को बताया जाता है “लोकतंत्र”और उसके आदर्श तारीफ़ें लेकिन पर्दे के पीछे खेल खेला जाता है युद्ध का -? जी हां सम्राज्यवादी- तानाशाही खेल।
वेनेज़ुएला अमेरिका की महत्वाकांक्षा और हमले का पहला शिकार नहीं है। ऐसे ही वियतनाम में गये ये लोग। जो अमेरिका के लिए बहुत बड़ा दलदल साबित हुआ और वहां अपनी इज़्ज़त दांव पर ही लौटना पड़ा, ये अलग बात है। अमेरिकी कहते थे कि गल्फ ऑफ टोंकिन की घटना के कारण उन्हें वियतनाम पर हमला करना पड़ा। साथ ही आरोप लगाया गया था कि उत्तरी वियतनाम ने पहले उसके जहाजों पर हमला किया था लेकिन बाद में ‘पेंटागन पेपर्स’ से खुलासा हुआ कि यह घटना बढ़ा-चढ़ाकर बताई गई थी ताकि युद्ध शुरू किया जा सके। इस हमले का असली कारण ‘कम्युनिज्म’ को फैलने से रोकना था क्योंकि डोमिनो थ्योरी का तर्क था कि अगर वियतनाम कम्युनिस्ट बना, तो पूरा दक्षिण-पूर्वी एशिया निशाना बनेगा। उसके बाद अमेरिका पनामा पर दौड़कर चढ़ा और वेनेज़ुएला की तरह पनामा में भी मैनुअल नोरिएगा पर ड्रग तस्करी का आरोप लगाकर हमला किया गया। लेकिन असली मक़सद पनामा नहर पर नियंत्रण बनाए रखना था।
क्योंकि नोरिएगा अमेरिका की बात मानना बंद कर चुका था इसलिए हमला करके सबक़ सिखाया गया। उसके बाद सोमालिया में जा चढ़े जबकि कहने को ये सोमालिया मे यूएन की मदद के लिए “मानवीय मिशन” के उद्देश्य पर गये थे लेकिन सच्चाई का खुलासा 1991 में लॉस एंजिल्स टाइम्स की एक रिपोर्ट में हुआ। जिसमें कहा गया था कि सोमालिया के गृहयुद्ध से ठीक पहले कोनोको,अमोको,शेवरॉन और फिलिप्स जैसी बड़ी अमेरिकी तेल कंपनियों को सोमालिया के बड़े हिस्से में तेल खोजने के अधिकार दिए गए थे। अमेरिका मानवीय मिशन के बहाने इन तेल क्षेत्रों को सुरक्षित करना चाहता था और सोमालिया ‘हॉर्न ऑफ अफ्रीका’ पर है, जहाँ से दुनिया का एक बड़ा व्यापारिक समुद्री मार्ग रैड समुद्र और स्वेज़ कैनाल गुज़रता है। कहने वाले कहते हैं कि अमेरिका इस रास्ते पर अपना सैन्य प्रभाव जमाने के लिए गया था। हालांकि यहां भी अमेरिका के लिए बड़ी परेशानियां खड़ी हुईं क्योंकि सोमालिया के सबसे शक्तिशाली गुट के नेता मोहम्मद फराह ऐदीद से उलझना बहुत महंगा पड़ा। फराह ऐदीद के सलाहकारों को पकड़ने के लिए सोमालिया की राजधानी मोगादिशु में अमेरिकी रेंजर्स फोर्स और डेल्टा फोर्स ने एक आपरेशन लांच किया लेकिन सोमाली लड़ाकों ने मार मार के अमेरिकी फौजों का भूत बना दिया। मोगादिशु की गलियों में भयानक जंग हुई जिसमे सोमालियों ने अमेरिका के दो ब्लैक हॉक हेलीकॉप्टर और अट्ठारह से ज़्यादा अमेरिकी सैनिक मार गिराए। अमेरिकी सैनिकों के शवों को मोगादिशु की सड़कों पर घसीटे जाने के वीडियो जब अमेरिका पहुंचे, तो वहां की जनता भड़क गई। इसके बाद राष्ट्रपति बिल क्लिंटन को अपनी सेना वापस बुलानी पड़ी। उसके बाद अमेरिका इराक में केमिकल वैपेन और परमाणु हथियारों का इल्ज़ाम लगाकर मिस्टर सद्दाम हुसैन पर टूट पड़े। ये आधुनिक इतिहास का सबसे विवादित हमला माना जाता है क्योंकि स्वयं अमेरिकी जाँच में इराक में कोई केमिकल वैपेन नहीं मिला। सच्चाई ये थी कि सद्दाम हुसैन डॉलर के बजाय यूरो में तेल बेचने लगे थे। जो अमेरिकी वर्चस्व के लिए चुनौती बन रहा था और परिणामस्वरूप इराक़ के विशाल तेल भंडारों पर नियंत्रण पाने के लिए इराक की तबाही बर्बादी के लिए पूरी ताकत झोंक दी गई।
मध्य एशिया के अफगानिस्तान में ओसामा बिन लादेन को पकड़ने,तालिबान और वहां के अफीम सम्राज्य को ख़त्म करने का नाम लेकर अमेरिका घुसा। लेकिन वहां की भी सच्चाई अलग ही थी। ये मध्य एशिया के संसाधनों पर नज़र रखने के लिए और अफगानिस्तान मे स्थायी मिलिट्री बेस बनाने गये थे और जिस अफीम सम्राज्य को ख़त्म करने गये थे, वो बाद मे इनकी ही देख-रेख मे फलने फूलने लगा।
फिर लीबिया के शासक गद्दाफी इनकी रडार में आए। यहां जाने से पहले भी दुनिया को यही बताया कि “मानवता की रक्षा” और तानाशाह गद्दाफी से जनता को बचाने के लिए हमला किया गया है। लेकिन सच्चाई जगजाहिर है कि गद्दाफी अफ्रीका के लिए एक ‘गोल्ड दीनार’ मुद्रा शुरू करना चाहते थे। जो डॉलर के प्रभुत्व को ख़त्म कर देती, इसलिए उसे तानाशाह घोषित करवा के मार दिया गया।
एक के बाद एक ऐसे बहुत से उदाहरण हैं जो साबित करते हैं कि अपने हितों और स्वार्थों के लिए दुनिया को कहानी कुछ और बतायी जाती है जबकि उसके पीछे का उद्देश्य कुछ और होता है।
अमेरिका द्वारा म्यांमार,श्रीलंका,बांग्लादेश के साथ साथ भारत में भी दखल अंदाजी पूरी दरियादिली के साथ होती रही है। कहा जा रहा है कि जैसे जैसे ब्रिक्स की गोल्ड बेस्ड कैरेंसी सच होती जाएगी ! वैसे वैसे भारत और उसके आसपास भी घेरा तंग होता जाएगा।
अमेरिका पूरी दुनिया में अपनी कूटनीति के बीज बोता रहा है। उसके द्वारा बताया कुछ जाता है और किया कुछ जाता है। पर्दे के पीछे ऐसा कुछ होता है जिससे साबित होता है कि अमेरिका सब-कुछ अपनी मुठ्ठी में रखना चाहता है चाहे इसके लिए कुछ भी क्यों न करना पड़े। लेकिन डंका आदर्शों, लोकतंत्र और मानवतावाद का पीटा जाता है।







