24 साल से “वेतन-पेंशन नहीं” के मुद्दे पर पूर्व सैनिक हो गये अर्द्धनग्न।
दाभोल - एनटीपीसी मामले में तत्काल कार्रवाई नहीं हुई तो शुरू करेंगे अनिश्चितकालीन धरना

धिक्कार है ऐसे सिस्टम पर जहां पूर्व सैनिकों को होना पड़े नंगा।

नई दिल्ली (एशियन पत्रिका/अनवार अहमद नूर)
आज पत्रकार जगत और मीडिया भी अचंभित हो गया कि जब दाभोल- एनटीपीसी से जुड़े पूर्व सैनिकों ने प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करके 24 वर्षों से लंबित वेतन और पेंशन के मुद्दे पर सरकार और संबंधित संस्थानों के ख़िलाफ़ कड़ा रोष प्रकट किया।
पूर्व सैनिक अपनी पीड़ा और व्यथा सुनाते सुनाते न सिर्फ़ रोने लगे बल्कि उन्होंने अपने कुछ कपड़ों को उतार दिया और अर्द्धनग्न हो गये। मीडिया के लोग भी ग़मज़दा हो गये।
पूर्व सैनिकों ने स्पष्ट कहा कि अब और इंतज़ार नहीं कर सकते यदि अब तत्काल कार्रवाई नहीं हुई तो उनका अनिश्चितकालीन आंदोलन शुरू होगा।
मुंबई से आए वरिष्ठ पूर्व सैनिकों ने मीडिया के सामने पूरे मामले से जुड़े दस्तावेज पेश किए। उन्होंने बताया कि वर्षों तक सेवा देने के बावजूद संबंधित संस्थानों ने न तो वेतन दिया और न ही पेंशन। जिसका सीधा प्रभाव उन पर और उनके परिवारों पर पड़ा है। कई पूर्व सैनिक बुज़ुर्ग हो चुके हैं और इलाज, भोजन व आवास जैसी बुनियादी ज़रूरतों के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
पूर्व सैनिकों ने कहा कि “जय हिंद, जय जवान” उनके लिए केवल नारा नहीं, बल्कि पहचान है। लेकिन आज वही सैनिक अपने हक़ के लिए सड़कों पर आने को मजबूर हैं। वक्ताओं ने इसे सिस्टम की गंभीर विफलता बताया।
कई पूर्व सैनिक भावनात्मक हो कर रोने तक लगे। 24 वर्षों का इंतज़ार और लगातार संघर्ष की पीड़ा उनके शब्दों में झलक रही थी। उसी भावनात्मक क्षण में अनेक पूर्व सैनिकों ने यह कहते हुए अपने ऊपरी कपड़े उतारकर प्रतीकात्मक प्रदर्शन किया कि अब उनके पास खोने को कुछ नहीं बचा है। यह दृश्य इतना मार्मिक था कि मौके पर मौजूद कई पत्रकार भी भावुक हो उठे और उनकी आंखें नम हो गईं। पत्रकारों ने एक स्वर में भरोसा दिलाया कि वे इस मुद्दे को दबने नहीं देंगे और पूर्व सैनिकों की यह आवाज़ देश-दुनिया तक पहुंचाएंगे।
पूर्व सैनिक लक्ष्मण महाडिक ने कहा कि 24 साल किसी भी व्यक्ति के जीवन का बड़ा हिस्सा होते हैं। “हमने सेवाएं दीं, लेकिन बदले में सिर्फ टालमटोल मिली। अब सब्र ख़त्म हो चुका है।”
सूर्यकांत पवार ने कहा कि यह मामला भावनात्मक नहीं, बल्कि पूरी तरह दस्तावेज़ों पर आधारित है। “हमने आज सारे रिकॉर्ड मीडिया के सामने रख दिए हैं। अब जवाबदेही तय होनी चाहिए।”
पूर्व सैनिक आर. जी. पवार ने सवाल उठाया कि देश के लिए काम करने वाले सैनिक आख़िर किस हाल में पहुंच गए हैं। हर युद्ध जीतने वाले सैनिक आज रोटी, कपड़ा और दवा के लिए जूझ रहे हैं। वी. एस. सालुंखे ने साफ चेतावनी दी कि अब संघर्ष टालना संभव नहीं है। “हम सभी संवैधानिक रास्ते अपना चुके हैं। अब न्याय मिलेगा या आंदोलन तेज़ होगा।”
प्रेसवार्ता के दौरान सुरेश पचपुटे ने मीडिया से अपील की कि इस मुद्दे को दबने न दिया जाए।
“अगर आज भी आवाज नहीं उठी, तो यह संदेश जाएगा कि सैनिकों के अधिकारों की कोई अहमियत नहीं है।”
चंद्रकांत शिंदे ने कहा कि यह लड़ाई अब सिर्फ 96 लोगों तक सीमित नहीं रही, बल्कि 96 परिवारों के भविष्य का सवाल बन चुकी है। विजय निकम ने आगे की रणनीति स्पष्ट करते हुए कहा कि यदि तुरंत कार्रवाई नहीं हुई, तो दाभोल/एनटीपीसी मुख्यालय के सामने अनिश्चितकालीन धरना दिया जाएगा। पूर्व सैनिकों ने दोहराया कि वे शांतिपूर्ण और संवैधानिक तरीके से न्याय की मांग कर रहे हैं, लेकिन 24 वर्षों की लगातार उपेक्षा ने उन्हें अब संघर्ष और आंदोलन करने पर मजबूर कर दिया गया।








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