नगाँव लोकसभा उप-चुनाव — “राइज़र दल” के वोट बंटवारे से BJP का हुआ फायदा – रमेन बोरठाकुर।
नगाँव लोकसभा उप-चुनाव — “राइज़र दल” के वोट बंटवारे से BJP का हुआ फायदा - रमेन बोरठाकुर।

नगाँव लोकसभा उप-चुनाव — “राइज़र दल” के वोट बंटवारे से BJP का हुआ फायदा – रमेन बोरठाकुर।
पंकज नाथ, असम :
असम के नगाँव लोकसभा उप-चुनाव में धिंग विधानसभा क्षेत्र के वैकल्पिक मतदान पैटर्न ने राजनीतिक बहस तेज कर दी है। पिछली विधानसभा चुनाव में राइज़र दल के उम्मीदवार ने धिंग में कुल मतदाताओं में से लगभग 60% यानी 1,31,183 वोट प्राप्त कर विपक्षी मोर्चे की मजबूत स्थिति दर्शाई थी। इस बार उप-चुनाव से पहले राइज़र दल के नेता अखिल गोगोई ने मित्र दलों से दूरी बना ली—और उसके बाद धिंग के लगभग 1.30 लाख राइज़र-दल समर्थक वोट कांग्रेस की ओर न जाकर बड़े पैमाने पर AIUDF (ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट) के पक्ष में चले गए। AIUDF के बदरुद्दीन अजमल को यहां लगभग 1,21,832 वोट मिले, जबकि BJP को लगभग 45,000 वोट मिले। राइज़र दल के पूर्व कार्यकारी अध्यक्ष रमेन बोरठाकुर ने आरोप लगाया कि राइज़र दल के पारंपरिक 1,31,183 वोटों का विभाजन कर विपक्षी वोट बंट गया और परिणामस्वरूप BJP को अप्रत्यक्ष लाभ हुआ। उनका तर्क यह है कि यदि राइज़र दल का वोट कांग्रेस की ओर गया होता तो धिंग विधानसभा सीट कांग्रेस के पक्ष में जा सकती थी; परंतु राइज़र दल के वोटों का एक बड़ा हिस्सा AIUDF में शिफ्ट होने से विपक्ष का वोट विभाजित हुआ और BJP के लिए स्थिति अनुकूल बनी। तथ्यों पर नजर डालें तो: पिछली विधानसभा में राइज़र दल ने धिंग में लगभग 1,31,183 वोट जीते थे। इस उप-चुनाव में AIUDF को लगभग 1,21,832 वोट मिले। BJP को इस क्षेत्र में करीब 45,000 वोट मिले। कांग्रेस ने धिंग में अपेक्षित समर्थन नहीं जुटा पाई, जिससे उसकी जीत नहीं हो सकी। विश्लेषण संकेत करता है कि राइज़र दल का वोट सीधे कांग्रेस को न पहुँचकर AIUDF में गया, जिससे विपक्षी मतों का बिखराव हुआ। वोट बंटने के कारण BJP को प्रत्यक्ष बड़ी बढ़त नहीं मिलना के बावजूद भी लाभकारी स्थिति बनी रही। हालांकि यह भी स्पष्ट है कि केवल राइज़र दल के वोटों के शिफ्ट होने को ही चुनाव परिणाम का एकमात्र कारण मानना सही नहीं होगा — स्थानीय मुद्दे, प्रत्याशी की स्वीकार्यता, सर्वेक्षण-प्रचार, और क्षेत्रीय गठबंधनों का भी निर्णायक प्रभाव रहता है। नतीजा यह है कि धिंग में विपक्षी वोटों का विभाजन हुआ और इससे बीजेपी के लिए मुकाबला आसान हो गया, भले ही जीत का सरोकार सीधे-सीधे राइज़र दल के इरादे पर निर्भर न किया जा सके। राजनीति में ऐसे वोट-शिफ्ट और गठबंधन तेजी से चुनावी नक्शा बदल देते हैं, और धिंग का यह मामला इसका नया उदाहरण बनकर उभरा है।







