जामिया अरबिया अफ़ज़लुल उलूम, मेवात में “ख़त्म-ए-मिश्कात शरीफ़ एवं दस्तारबंदी जलसा” आयोजित

मुहद्दिसीन की सेवाएं इस्लाम की महान शैक्षिक विरासत हैं : मौलाना मुहम्मद क़ासिम मज़ाहिरी

नई दिल्ली (अनवार अहमद नूर/एशियन पत्रिका)
हरियाणा के प्रसिद्ध शिक्षण संस्थान जामिया अरबिया अफ़ज़लुल उलूम, मेवात में “ख़त्म-ए-मिश्कात शरीफ़ एवं दस्तारबंदी जलसा” का भव्य आयोजन किया गया। इस अवसर पर विशेष अतिथि के रूप में मज़ाहिरुल उलूम, सहारनपुर के उस्ताद-ए-हदीस और शैख़ुल हदीस हज़रत मौलाना ज़करिया कांधलवी रह॰ के दो नवासे मौलाना मुहम्मद क़ासिम मज़ाहिरी और मौलाना मुहम्मद उमैर मज़ाहिरी तशरीफ़ लाए।
कार्यक्रम की अध्यक्षता मेवात की महान धार्मिक हस्ती मौलाना यह्या करीमी ने की, जबकि सरपरस्ती जामिया के मोहतमिम, जमीयत उलमा मुत्तहिदा पंजाब के उपाध्यक्ष एवं दीनी तालीमी बोर्ड हरियाणा के अध्यक्ष मास्टर मुहम्मद क़ासिम ज़फ़र ने की। कार्यक्रम का संचालन मुफ़्ती अता-उर-रहमान जामई ने बहुत ही सुंदर ढंग से किया। निगरानी की ज़िम्मेदारी जामिया के नायब मोहतमिम और जमीयत उलमा मेवात के कार्यालय सचिव मौलाना अज़हर क़ासिम ज़फ़र अशरफ़ी ने निभाई।
विशेष अतिथियों का स्वागत जामिया के छात्रों और ज़िम्मेदारों द्वारा फूलों और गुलदस्तों के साथ बड़े ही उत्साह से किया गया। कार्यक्रम का औपचारिक आरंभ क़ारी नईम की शानदार तिलावत-ए-क़ुरआन से हुआ। इसके बाद नात-ए-नबी ﷺ प्रस्तुत की गई। तत्पश्चात छात्रों ने विभिन्न धार्मिक और साहित्यिक प्रस्तुतियाँ पेश कीं, जिनमें नात-ए-रसूल ﷺ, तक़रीरें, कविताएँ, अरबी-उर्दू संवाद और एक्शन नज़्म शामिल थीं। छात्रों की उत्कृष्ट प्रस्तुतियों को उपस्थित जनसमूह ने खूब सराहा।
विशेष अतिथि मौलाना मुहम्मद क़ासिम मज़ाहिरी ने मिश्कात शरीफ़ की अंतिम हदीस पूरी कराई और छात्रों व उपस्थित जनसमूह को इल्म-ए-हदीस की अहमियत, इख़लास तथा शैक्षिक जीवन में दीन को लागू करने पर विस्तृत और तर्कपूर्ण संबोधन किया। उन्होंने कहा कि सहाबा-ए-कराम ने हदीसों को याद किया, लिखा और आगे पहुँचाया। बाद में मुहद्दिसीन ने अत्यंत परिश्रम, अनुसंधान और जाँच-पड़ताल के बाद सहीह, हसन और ज़ईफ़ हदीसों को अलग-अलग वर्गीकृत किया। इमाम बुख़ारी, इमाम मुस्लिम और अन्य मुहद्दिसीन की सेवाएँ इस्लाम की महान शैक्षिक विरासत हैं, जिनके कारण आज हमारे पास प्रमाणिक हदीसों का अमूल्य ख़ज़ाना मौजूद है।
उन्होंने कहा कि इस्लाम एक संपूर्ण जीवन-व्यवस्था है, जो मानव के व्यक्तिगत, सामूहिक, नैतिक और आध्यात्मिक जीवन का मार्गदर्शन करती है। क़ुरआन-ए-मजीद इस्लाम की मूल पुस्तक है, लेकिन क़ुरआन को समझने, उस पर अमल करने और उसकी व्याख्या के लिए हदीस-ए-नबवी अत्यंत आवश्यक स्रोत है। हदीस वास्तव में रसूलुल्लाह ﷺ के कथनों, कर्मों और स्वीकृतियों का संग्रह है, जो हमें यह सिखाती है कि क़ुरआन के आदेशों को व्यावहारिक जीवन में कैसे लागू किया जाए। उन्होंने आगे कहा कि क़ुरआन-ए-मजीद में कई आदेश संक्षेप में वर्णित हैं, जिनकी व्याख्या हदीस के माध्यम से होती है। उदाहरण के तौर पर क़ुरआन में नमाज़ क़ायम करने का आदेश है, लेकिन नमाज़ की रकअतें, तरीका, समय और शर्तें हमें हदीस से ही ज्ञात होती हैं। इसी प्रकार ज़कात, रोज़ा, हज और अन्य इबादतों का विवरण भी हदीस से प्राप्त होता है। इस प्रकार हदीस, क़ुरआन की व्यावहारिक तफ़सीर है। हदीस मानव के आचरण को संवारती है। रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया “मुझे अच्छे आचरण की पूर्णता के लिए भेजा गया है।” हदीसें हमें सब्र, शुक्र, विनम्रता, इख़लास और दयालुता जैसी खूबियाँ अपनाने की प्रेरणा देती हैं, जो एक आदर्श इस्लामी समाज की बुनियाद हैं। हदीस केवल इबादतों तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज, व्यापार, नैतिकता, न्याय, मानवाधिकार और अच्छे व्यवहार के सिद्धांत भी सिखाती है। माता-पिता के अधिकार, पड़ोसियों के साथ अच्छा व्यवहार, सच बोलना, अमानतदारी और वादे की पाबंदी ये सभी शिक्षाएँ हमें हदीस के माध्यम से मिलती हैं। नबी करीम ﷺ का जीवन हमारे लिए सर्वोत्तम आदर्श है।
इसके बाद मौलाना उमैर मज़ाहिरी ने समाज सुधार और दीनी शिक्षा की आवश्यकता पर व्यापक संबोधन किया। उन्होंने कहा कि समाज सुधार का एकमात्र और स्थायी समाधान दीनी शिक्षा के प्रचार और उस पर व्यावहारिक अमल में निहित है। जब व्यक्ति सुधर जाएगा, तो समाज स्वतः सुधर जाएगा। समाज व्यक्तियों का समूह है और व्यक्तियों के सुधार के बिना समाज का सुधार संभव नहीं। आज हमारा समाज नैतिक पतन, भटकाव, स्वार्थ और असहिष्णुता जैसी समस्याओं से जूझ रहा है। इन सभी बुराइयों की मूल वजह दीन से दूरी और सही दीनी शिक्षा का अभाव है। दीनी शिक्षा इंसान को जीवन के उद्देश्य से परिचित कराती है। इस्लाम हमें सिखाता है कि हम केवल अपने लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए लाभकारी बनें। क़ुरआन-ए-करीम और सुन्नत-ए-रसूल ﷺ मानव के चरित्र, नैतिकता, लेन-देन और सामाजिक ज़िम्मेदारियों का संपूर्ण मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। जब ये शिक्षाएँ जीवन से निकल जाती हैं, तो ज़ुल्म, झूठ, बेईमानी और अन्याय आम हो जाता है। समाज सुधार के लिए सबसे पहले व्यक्ति का सुधार ज़रूरी है, और व्यक्ति का सुधार दीनी शिक्षा के बिना संभव नहीं। दीनी शिक्षा इंसान के भीतर तक़वा, ज़िम्मेदारी की भावना, सब्र, सहनशीलता, न्याय और करुणा जैसी विशेषताएँ पैदा करती है, जो एक नेक समाज की बुनियाद हैं।
मौलाना यह्या करीमी ने कहा कि आज के दौर में ज़रूरत इस बात की है कि दीनी शिक्षा को केवल मस्जिदों और मदरसों तक सीमित न रखा जाए, बल्कि उसे व्यावहारिक जीवन का हिस्सा बनाया जाए। घरों में बच्चों की दीनी तरबियत, शैक्षिक संस्थानों में नैतिक शिक्षा और सामाजिक स्तर पर इस्लामी मूल्यों का प्रचार समय की सबसे बड़ी ज़रूरत है। रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: “तुम में सबसे बेहतर वह है जिसके आचरण सबसे अच्छे हों।” यह हदीस स्पष्ट करती है कि इस्लाम केवल इबादतों का नाम नहीं, बल्कि उच्च नैतिकता और श्रेष्ठ सामाजिक व्यवहार का धर्म है। यदि हम चाहते हैं कि हमारा समाज शांति, न्याय और भाईचारे का केंद्र बने, तो हमें दीनी शिक्षा को प्राथमिकता देनी होगी। यही शिक्षा हमें अच्छा इंसान, ज़िम्मेदार नागरिक और चरित्रवान मुसलमान बनाती है।
इसके पश्चात मिश्कात शरीफ़ से फ़ारिग़ होने वाले छात्रों और हिफ़्ज़-ए-क़ुरआन पूरा करने वाले हाफ़िज़ों की विद्वान उलेमा द्वारा दस्तारबंदी की गई और उन्हें दुआओं से नवाज़ा गया।
कार्यक्रम में क्षेत्र और देश की अनेक प्रतिष्ठित हस्तियों ने भाग लिया, जिनमें दिल्ली के प्रसिद्ध संस्थान मदरसा बाबुल उलूम, जाफ़राबाद के मोहतमिम व हज़रत मौलाना दाऊद ज़फ़र अमीनी रह॰ के उत्तराधिकारी मौलाना ओवैस अहमद रशीदी, मौलाना मुहम्मद शम्सुल क़मर अमीनी, हाफ़िज़ मुहम्मद असद, मौलाना उबैदुल्लाह ज़फ़र क़ासमी, मास्टर ख़ुर्शीद अहमद, मौलाना अता-उर-रहमान अजमली, मुफ़्ती मुहम्मद सादिक़ क़ासमी, मुफ़्ती मुहम्मद आमिर, हाफ़िज़ अलीम, मौलाना इकरामुद्दीन, मौलाना अकबर, मौलाना इमरान, मास्टर रफ़ीक़, मौलाना साबिर मज़ाहिरी, क़ारी यूनुस, क़ारी ज़करिया, मुफ़्ती रिज़वान, मुफ़्ती ख़ुर्शीद, मुफ़्ती ज़ुबैर, मुफ़्ती शुऐब, मुफ़्ती अब्दुल क़य्यूम, मौलाना शाकिर, क़ारी मुस्तफ़ा, क़ारी मुमताज़, क़ारी महबूब, क़ारी इनज़िमाम, मास्टर अब्दुल हमीद, मास्टर अब्दुल वकील, हाफ़िज़ ज़ाहिद, हाफ़िज़ जावेद, हाफ़िज़ मुश्ताक़, हाफ़िज़ तफ़ज़्ज़ुल, हाफ़िज़ आसिफ़, हाफ़िज़ अब्दुल्लाह, हाफ़िज़ रुकनुद्दीन, मौलाना फ़ारूक़, मौलाना तय्यब साकरस, मौलाना असलम, मुहम्मद लुक़मान सहित मेवात के अनेक उलेमा-ए-दीन शामिल रहे। बड़ी संख्या में आम लोग भी मौजूद रहे।
अंत में मौलाना उमैर मज़ाहिरी की दुआ पर इस बरकत-भरे और यादगारी कार्यक्रम का समापन हुआ।

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