अखलाक लिंचिंग केस में अदालत ने यूपी सरकार की याचिका को किया ख़ारिज.

नोएडा के सूरजपुर की कोर्ट में सरकार ने आरोपियों के ख़िलाफ़ दर्ज मुकदमे वापस लेने की याचिका लगाई थी

माकपा (सीपीआई एम) की वरिष्ठ नेता कामरेड बृंदा करात ने माननीय न्यायाधीश के इस साहसी फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि आज भारतीय न्यायपालिका ने यह सिद्ध कर दिया है कि कानून की नज़र में सभी समान हैं और ‘मॉब लिंचिंग’ जैसे जघन्य अपराधों में संलिप्त लोगों को राजनीतिक संरक्षण नहीं दिया जा सकता। इस तरह के अदालती फैसले लोकतंत्र में जनता के विश्वास को मज़बूत करते हैं।

नई दिल्ली/नोएडा (यूपी)(अनवार अहमद नूर)
ग्रेटर नोएडा के 10 साल पुराने अखलाक लिंचिंग केस में यूपी सरकार की याचिका को कोर्ट ने मंगलवार को खारिज कर दिया है। नोएडा के सूरजपुर की कोर्ट में सरकार ने आरोपियों के खिलाफ दर्ज मुकदमे वापस लेने की याचिका लगाई थी। कोर्ट में कहा कि केस वापसी के लिए लगाई गई अर्जी में कोई ठोस कानूनी आधार नहीं है। आरोपियों के खिलाफ चल रही कानूनी न्यायिक प्रक्रिया चलती रहेगी। अगली सुनवाई 6 जनवरी, 2026 को होगी। कोर्ट ने मामले में रोज सुनवाई की बात भी कही है।
28 सितंबर 2015 की रात दादरी के बिसाहड़ा गांव में मंदिर से ऐलान के बाद अफ़वाह फैली कि मोहम्मद अखलाक (50) ने गाय काटी और उसके मांस को घर में रखा है। भीड़ ने अखलाक और उनके बेटे दानिश को घर से बाहर घसीटा और बुरी तरह पीटा। अखलाक की नोएडा के एक अस्पताल में मौत हो गई, जबकि दानिश गंभीर सिर की चोटों के बाद बड़ी सर्जरी से बच पाया।
यूपी सरकार के वकील ने इसी साल अक्टूबर में अखलाक लिंचिंग केस में कोर्ट में याचिका दायर कर कहा था कि मुकदमा वापसी से सामाजिक सौहार्द बहाल होगा।
यूपी सरकार को उस वक्त करारा झटका लगा कि जब ग्रेटर नोएडा के सूरजपुर ज़िला अदालत ने बिसाहड़ा के बहुचर्चित अखलाक लिंचिंग मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए ज़िला कोर्ट ने आरोपियों के ख़िलाफ़ दर्ज मुकदमा वापस लेने की यूपी सरकार की याचिका को ख़ारिज कर दिया। सुनवाई के दौरान अदालत ने अभियोजन पक्ष की दलीलों को आधारहीन माना और स्पष्ट किया कि केस वापसी का कोई ठोस कानूनी आधार नहीं है। इस फैसले के साथ ही आरोपियों को राहत दिलाने की कोशिशों पर विराम लग गया है और अब उनके ख़िलाफ़ कानूनी ट्रायल जारी रहेगा।
उत्तर प्रदेश सरकार ये केस वापस लेना चाहती है। जबकि नोएडा कोर्ट ने सरकार की ये याचिका खारिज कर दी है, मतलब, आरोपियों पर क्रिमिनल केस चलता रहेगा।
अतिरिक्त जिला जज सौरभ द्विवेदी ने मामले को ‘सबसे महत्वपूर्ण’ श्रेणी में रखते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष को जल्द से जल्द गवाहियों को दर्ज कराना होगा। कोर्ट ने गौतम बुद्ध नगर के पुलिस कमिश्नर और ग्रेटर नोएडा के डिप्टी कमिश्नर को पत्र लिखकर साक्ष्यों की पूरी सुरक्षा सुनिश्चित करने का आदेश भी दिया है।

मरहूम अखलाक की पत्नी इकरामन की शिकायत पर जारचा थाने में आईपीसी की धारा 302 (हत्या), 307 (हत्या का प्रयास), 147 (दंगा), 148 (घातक हथियारों से दंगा), 149 (गैरकानूनी जमावड़ा), 323 (मारपीट) और 504 सहित अन्य धाराओं में एफआईआर दर्ज हुई। पुलिस ने 23 दिसंबर 2015 को चार्जशीट दाखिल की, जिसमें 15 लोगों (एक नाबालिग सहित) का नाम था। इस मामले में स्थानीय भाजपा नेता संजय राणा के बेटे विशाल राणा सहित 18 आरोपी हैं। सभी ज़मानत पर हैं। 2021 से ये केस कोर्ट में ट्रायल पर चल रहा है।

सुनवाई के दौरान न्यायालय में माकपा (सीपीआई एम) की वरिष्ठ नेता कामरेड बृंदा करात ने माननीय न्यायाधीश के इस साहसी फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि आज भारतीय न्यायपालिका ने यह सिद्ध कर दिया है कि कानून की नज़र में सभी समान हैं और ‘मॉब लिंचिंग’ जैसे जघन्य अपराधों में संलिप्त लोगों को राजनीतिक संरक्षण नहीं दिया जा सकता। इस तरह के अदालती फैसले लोकतंत्र में जनता के विश्वास को मज़बूत करते हैं।
​न्याय के प्रति हमारी प्रतिबद्धता यह फैसला उन तमाम ताकतों के लिए एक चेतावनी है जो भीड़ तंत्र और नफ़रत की राजनीति के ज़रिए देश के सौहार्द को बिगाड़ना चाहते हैं। अख़लाक़ के परिवार को न्याय दिलाने की यह लड़ाई अब अपने निर्णायक मोड़ पर है। हम मांग करते हैं कि सरकार अब और बाधाएं डालने के बजाय कानून को अपना काम करने दे ताकि दोषियों को उनके किए की सज़ा मिल सके।
जिला न्यायालय में सुनवाई के दौरान कामरेड वृंदा करात के साथ माकपा जिला सचिव राम सागर, सीटू नेता गंगेश्वर दत्त शर्मा, मुकेश कुमार राघव, सुखलाल, जनवादी महिला समिति की नेता रेखा चौहान, किरण देवी, लॉयर्स यूनियन के अधिवक्ता अरुण कुमार सहित दर्जनों माकपा का कार्यकर्ता मौजूद रहे।

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