राष्ट्रीय उर्दू परिषद की ओर से पुस्तक मेले में ‘युवा कवियों से संवाद’ और ‘शाम-ए-अफ़साना’ पर   गोष्ठियां 

साहित्य से जुड़े लेखकों, विद्यार्थियों और साहित्य-प्रेमियों ने बड़ी संख्या में भाग लिया।

नई दिल्ली (अनवार अहमद नूर/एशियन पत्रिका)

राष्ट्रीय उर्दू परिषद (एनसीपीयूएल) के तत्वावधान में विश्व पुस्तक मेला, नई दिल्ली के दूसरे दिन दो महत्वपूर्ण साहित्यिक गोष्ठियों—‘युवा कवियों से संवाद’ और ‘शाम-ए-अफ़साना’—का आयोजन किया गया। इन गोष्ठियों में साहित्य से जुड़े लेखकों, विद्यार्थियों और साहित्य-प्रेमियों की बड़ी संख्या ने भाग लिया।

‘शाम-ए-अफ़साना’ शीर्षक से आयोजित गोष्ठी में डॉ. निगार अज़ीम, डॉ. शबाना नज़ीर, डॉ. रुख़संदा रूही मेहदी और डॉ. शहनाज़ रहमान पैनलिस्ट के रूप में शामिल हुईं, जबकि संचालन की ज़िम्मेदारी डॉ. ज़ाकिर फ़ैज़ी ने निभाई। वक्ताओं ने अफ़साने की रचना, उसके फ़नी (कलात्मक) और फ़िक्री (वैचारिक) पहलुओं तथा समकालीन आवश्यकताओं पर विस्तार से विचार रखे।

इस अवसर पर डॉ. निगार अज़ीम ने कहा कि अफ़साना जीवन का प्रतीक है और उसे खाँचों में बाँटा नहीं जा सकता, हालांकि समय के साथ उसकी तकनीक में बदलाव आया है। उन्होंने कहा कि प्रतीकवाद हो या उत्तर-आधुनिकता, पाठक स्वयं पहचान लेता है कि कौन-सा अफ़साना दीर्घकालिक है। युवा कथाकारों के संदर्भ में उन्होंने कहा कि उनकी रचनाएँ कुल मिलाकर संतोषजनक हैं, लेकिन जल्दबाज़ी से बचने की आवश्यकता है। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि यदि अफ़साना सामाजिक मुद्दों से जुड़ा हो तो उम्र की सीमा के बिना भी उसका प्रभाव होता है। सोशल मीडिया की लोकप्रियता को मानक मानने से इंकार करते हुए उन्होंने कहा कि कला एक इबादत है और उसका फल तुरंत नहीं मिलता।

डॉ. शबाना नज़ीर ने कहा कि अफ़साना कई तत्वों का समुच्चय है, जिनमें से किसी एक को अलग नहीं किया जा सकता। श्रेष्ठ अफ़साना वही है जो पाठक के मन में बस जाए। उन्होंने ज़किया मशहदी को एक महत्वपूर्ण कथाकार बताते हुए कहा कि उनके अफ़सानों के विषय और प्रस्तुति विशिष्ट हैं। सोशल मीडिया पर लिखे जा रहे अफ़सानों के संदर्भ में उन्होंने कहा कि हर अफ़साने को एक ही श्रेणी में रखना उचित नहीं—चाहे वह प्रिंट माध्यम में हो या डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर।

डॉ. रुख़संदा रूही मेहदी ने कहा कि वर्तमान दौर में पाठकों की संख्या में कमी ज़रूर आई है, लेकिन इससे अत्यधिक निराश होने की ज़रूरत नहीं। अध्ययन के लिए अब अनेक नए प्लेटफ़ॉर्म उपलब्ध हैं और अच्छे पाठक आज भी मौजूद हैं। उन्होंने उर्दू और हिंदी अफ़सानों की तुलना से बचने पर ज़ोर देते हुए कहा कि हर भाषा की अपनी शैली और स्वभाव होता है।

डॉ. शहनाज़ रहमान ने कहा कि निष्पक्ष और गुणवत्तापूर्ण आलोचना ही साहित्य को आगे बढ़ाती है। उनके अनुसार अफ़साने का मूल्यांकन व्यक्तिगत पसंद-नापसंद के बजाय फ़नी और फ़िक्री मानकों पर होना चाहिए। उन्होंने आगे कहा कि नई पीढ़ी के कथाकारों को आलोचना से डरने के बजाय उसे रचनात्मक विकास का माध्यम बनाना चाहिए। गोष्ठी के अंत में सभी कथाकारों ने अपने-अपने अफ़सानों से चुने हुए अंश भी प्रस्तुत किए।

इससे पहले ‘युवा कवियों से संवाद’ शीर्षक से आयोजित गोष्ठी में सालेम सलीम, खुशबू परवीन और सफ़ीर सिद्दीक़ी ने भाग लिया, जबकि संचालन डॉ. शादाब शमीम ने किया।

इस अवसर पर सालेम सलीम ने कविता में भाषा के महत्व पर ज़ोर देते हुए कहा कि अच्छी भाषा के बिना गुणवत्तापूर्ण कविता संभव नहीं। मुशायरों के संदर्भ में उन्होंने कहा कि अतीत के मुशायरे उर्दू भाषा और साहित्य के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे और आज के मुशायरे भी लोगों को उर्दू भाषा और साहित्य के क़रीब ला रहे हैं।

खुशबू परवीन ने कहा कि उन्हें कविता का शौक़ बचपन से था, जिसकी शुरुआत मदरसे से हुई और विश्वविद्यालय तक पहुँचते-पहुँचते कविता उनकी पहचान बन गई। उन्होंने कहा कि कविता में गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं होना चाहिए।

सफ़ीर सिद्दीक़ी ने कहा कि कविता एक स्वाभाविक प्रतिभा है और लयात्मकता (मोज़ूनियत) के बिना अच्छी कविता संभव नहीं। उन्होंने ग़ज़ल को अपनी पसंदीदा विधा बताते हुए कहा कि वे ग़ज़ल में ही प्रयोग करते हैं। सोशल मीडिया की लोकप्रियता पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि लोकप्रिय होना गुणवत्ता की गारंटी नहीं है। गोष्ठी के अंत में युवा कवियों ने अपने चुने हुए अशआर भी सुनाए, जिन्हें उपस्थित श्रोताओं ने खूब सराहा।

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