गुवाहाटी की कृत्रिम बाढ़: जोराबाट की खुली खुदाई, वन विभाग की लापरवाही और पीडब्ल्यूडी की ड्रेनेज ढील के खिलाफ जनता का गुस्सा। 

गुवाहाटी की कृत्रिम बाढ़: जोराबाट की खुली खुदाई, वन विभाग की लापरवाही और पीडब्ल्यूडी की ड्रेनेज ढील के खिलाफ जनता का गुस्सा। 

गुवाहाटी की कृत्रिम बाढ़: जोराबाट की खुली खुदाई, वन विभाग की लापरवाही और पीडब्ल्यूडी की ड्रेनेज ढील के खिलाफ जनता का गुस्सा।

पंकज नाथ, असम, 23 अप्रैल :
अप्रैल के पूर्व‑मानसून में ही असम के गुवाहाटी पर बाढ़ जैसे हालात ने शहर को जलमग्न कर दिया। मालीगांव–बड़ागांव और आसपास के इलाकों में सड़कें नदियों में तब्दील हो गईं, घर‑दुकानें पानी में डूब गईं और जनजीवन पूरी तरह अस्त‑व्यस्त हो गया। इसी बीच पायल नाथ नाम की एक महिला खुले नाले में गिरकर डूब गईं, जिनका शव बाद में लगभग 250 मीटर दूर से बरामद हुआ। असम राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (ASDMA) ने इस घटना को “कृत्रिम बाढ़ और खुले नालों की स्थिति” से जोड़ते हुए जांच के आदेश दिए हैं, जिससे गुवाहाटी की बाढ़ पर जिम्मेदारी की बहस और तीखी हो गई है।जोराबाट क्षेत्र में लगातार चल रही “लाल मिट्टी” की खुली खुदाई पर स्थानीय निवासी और पर्यावरणविदों के लंबे समय से आरोप हैं। लोग कहते हैं कि हरे‑भरे पहाड़ों को काटकर खनन करने से जमीन की संरचना खोखली हो गई है और जल‑निकासी के प्राकृतिक मार्ग बदल गए हैं। जोराबाट और आसपास की वन‑भूमि पर जारी खनन लाइसेंस तथा उनकी निगरानी की मूल जिम्मेदारी वन विभाग के निचले और ऊपरी अधिकारियों पर है, लेकिन जमीनी स्तर पर नियंत्रण बेहद कमजोर दिखाई देता है। लोगों का आरोप है कि खनन माफिया और अर्थव्यवस्था से जुड़े कुछ हितधारक लाइसेंस‑प्रणाली और जांच‑पड़ताल की ढीलाई का फायदा उठा रहे हैं, जिससे जोराबाट के पहाड़ों की खुदाई बेलगाम बनी हुई है।स्थानीय आलोचना में यह साफ कहा जा रहा है कि जोराबाट क्षेत्र के पहाड़ों की खुली खुदाई ने जल‑निकासी के प्राकृतिक रास्तों को बदल दिया है, जिसके कारण मेघालय और आसपास से आने वाला पानी सीधे गुवाहाटी के निचले इलाकों—मालीगांव, बड़ागांव, जोराबाट आदि—पर भार डाल रहा है। वन विभाग के स्तर पर जोराबाट बीट अधिकारी, रेंजर और डीएफओ‑स्तरीय अधिकारियों की निगरानी‑चूक या अनिच्छा के कारण यह खनन जारी रहा, जबकि लोगों ने बार‑बार चेतावनी और शिकायतें दर्ज कराई थीं। कई लोग इसे सिर्फ “लापरवाही” नहीं बल्कि “आपराधिक चुप्पी” या “निगरानी‑प्रणाली की विफलता” मान रहे हैं, हालांकि ये अभी आरोप और चर्चा के स्तर पर ही हैं। इसी संदर्भ में पीडब्ल्यूडी विभाग पर भी जोरदार सवाल उठ रहे हैं। लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) शहर की मुख्य सड़कों और ड्रेनेज‑व्यवस्था से जुड़े बुनियादी ढांचे के निर्माण और रख‑रखाव के लिए जिम्मेदार है, लेकिन जोराबाट, मालीगांव और आसपास के इलाकों में नालों की गहराई अपर्याप्त, उनकी सफाई में कमी और सड़क काटकर निर्माण के बाद ड्रेनेज प्रणाली को ठीक से जोड़े जाने की लापरवाही के कारण पानी उलटकर सड़कों पर फैल रहा है। निवासी का आरोप है कि पीडब्ल्यूडी के यहां सिर्फ सड़क डामर‑पेवरमेंट पर फोकस रहता है, जबकि ड्रेनेज की तकनीकी योजना, नालों की गुणवत्ता और जल‑निकासी की लगातार देख‑रेख की पूरी तरह कमी है, जो इस “कृत्रिम बाढ़” में सीधे योगदान दे रही है। सरकारी बयानों में भारी बारिश और मेघालय के जलस्तर पर जोर दिया जाता है, लेकिन जनता और मीडिया इसे साफ जानबूझकर मानवनिर्मित आपदा बता रहे हैं। शहर में नालों का अवरोध, सीवरेज‑सिस्टम और जोराबाट के पहाड़ों की खुली खुदाई ने बाढ़ की तीव्रता बढ़ाई है, जबकि पायल नाथ जैसी घटनाएं इसी विफलता की सीधी कीमत हैं। लोगों का सवाल है कि अगर जल‑निकासी, नालों की सुरक्षा और पहाड़ों की खुदाई पर समय रहते कड़ी निगरानी रहती, तो क्या यह मौत टल सकती थी? जवाब दिखता है–हां, लेकिन वन विभाग, पीडब्ल्यूडी और प्रशासन की ओर से अभी तक सिर्फ मौन और आधे‑अधूरे बयान आए हैं। आसपास के निवासी और स्थानीय संगठनों ने प्रधान मुख्य वन संरक्षक (पीसीसीएफ) संदीप कुमार, मुख्य सचिव रवि कोटा, लोक निर्माण विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों और संबंधित जिम्मेदारों से सीधी मांग रखी है कि जोराबाट और आसपास की अनियंत्रित खनन गतिविधियों को तुरंत रोका जाए, वन विभाग के लाइसेंस‑प्रणाली, जमीनी निगरानी, जोराबाट बीट अधिकारी, रेंजर, डीएफओ‑स्तर तथा पीडब्ल्यूडी की ड्रेनेज‑लापरवाही पर स्वतंत्र और पारदर्शी जांच बैठाई जाए और खनन‑माफिया तथा जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाए। लोग कह रहे हैं कि जब “कृत्रिम बाढ़” की आशंका पहले से जाहिर थी, तब जोराबाट के पहाड़ों की खुदाई और नालों की गहराई‑सुरक्षा पर सख्ती से कदम नहीं उठाए गए, तो अब जवाबदेही से बचा नहीं जा सकता। गुवाहाटी को बचाने का समय अभी है, लेकिन यह सिर्फ तभी संभव होगा जब प्रशासन, वन विभाग और पीडब्ल्यूडी खनन‑लूट, निगरानी‑विफलता और ड्रेनेज‑लापरवाही के खिलाफ सार्वजनिक, त्वरित और दृढ़ कार्रवाई करेंगे; वरना बाढ़ की दावत लगातार बढ़ती रहेगी और हर बार किसी निर्दोष की जान इस जिम्मेदारी की कीमत बनती रहेगी।

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