जमाअत-ए-इस्लामी हिंद ने 2026 को “न्याय, शांति, एकता और सभी के लिए समावेशी व सतत विकास” का वर्ष घोषित किया 

नई दिल्ली (एशियन पत्रिका/अनवार अहमद नूर)

जमाअत-ए-इस्लामी हिंद (JIH) ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बढ़ते सांप्रदायिक ध्रुवीकरण, सर्दियों में गरीबों की परेशानियों को दूर करने तथा धार्मिक और क्षेत्रीय अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ लक्षित हिंसा पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। मीडिया को संबोधित करते हुए JIH के उपाध्यक्ष प्रो. सलीम इंजीनियर ने कहा कि भारत हमेशा से बहु धार्मिक देश रहा है, जहाँ सह-अस्तित्व और सांप्रदायिक सौहार्द की समृद्ध परंपरा रही है। उन्होंने कहा कि आमतौर पर हमारे धार्मिक नेताओं और संस्थानों ने विविधता में एकता को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, लेकिन आज यह विरासत खतरे में है। उन्होंने सांप्रदायिक बयानबाजी, इस्लामोफोबिया, नफरत भरे भाषणों, मॉब लिंचिंग और धार्मिक भेदभाव में वृद्धि पर गहरी चिंता जताई।

साउथ एशिया जस्टिस कैंपेन की इंडिया परसीक्यूशन ट्रैकर 2025 रिपोर्ट का हवाला देते हुए प्रो. इंजीनियर सलीम ने कहा कि इस रिपोर्ट में “धार्मिक अल्पसंख्यकों, विशेषकर मुसलमानों, के खिलाफ राज्य और गैर-राज्य तत्वों द्वारा किए जा रहे अत्याचारों में तेज़ बढ़ोतरी” दर्ज की गई है। इनमें गैर-न्यायिक हत्याएँ, मॉब हिंसा, मनमानी गिरफ्तारियाँ, दंडात्मक तोड़फोड़, खुलेआम नफरत भरे भाषण और जबरन निर्वासन शामिल हैं। उन्होंने कहा कि एक बड़े आतंकी घटना के बाद ये प्रवृत्तियाँ और तेज़ हो गईं, जिसके परिणामस्वरूप गौ-रक्षा और सुरक्षा के नाम पर बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियाँ हुईं तथा उग्रवाद विरोधी अभियानों में आदिवासियों की भारी जानें गईं। प्रो. सलीम इंजीनियर ने कहा कि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि कुछ ताकतें राजनीतिक लाभ के लिए धर्म का दुरुपयोग कर रही हैं और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के ज़रिए विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच खाई पैदा कर रही हैं।
साथ ही उन्होंने समाज की नैतिक शक्ति पर भरोसा जताते हुए कहा, “हमें विश्वास है कि भारत के लोगों में सांप्रदायिक ताकतों को परास्त करने की समझ और शक्ति है।” उन्होंने बताया कि जमाअत-ए-इस्लामी हिंद धार्मिक जन मोर्चा और सद्भावना मंच जैसे अंतर-धार्मिक और शांति प्रयासों के माध्यम से लगातार काम कर रही है। उन्होंने कहा, “इन मंचों ने संवाद, आपसी समझ और एकता के सेतु बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने घोषणा की कि इन प्रयासों को और मज़बूत करने के लिए जमाअत-ए-इस्लामी हिंद ने 2026 को “न्याय, शांति, एकता और सभी के लिए समावेशी व सतत विकास का वर्ष” घोषित करने का निर्णय लिया है, ताकि सामाजिक सद्भाव, न्याय, भाईचारे और सभी नागरिकों के बेहतर भविष्य के प्रति प्रतिबद्धता को दोहराया जा सके।

सर्दियों की परेशानियों पर बोलते हुए JIH के उपाध्यक्ष मलिक मोअतसिम खान ने कहा कि जमाअत-ए-इस्लामी हिंद समान विचारधारा वाले संगठनों के सहयोग से उत्तर और पूर्वी भारत में गरीबों और बेघर लोगों के लिए बड़े पैमाने पर कंबल वितरण अभियान चला रही है। उन्होंने कहा कि कड़ी ठंड की लहरें खुले में या अपर्याप्त आश्रयों में रहने वाले कमजोर वर्गों को सबसे अधिक प्रभावित करती हैं। उन्होंने कहा कि ज़रूरतमंदों को धर्म, जाति या पृष्ठभूमि की परवाह किए बिना गर्म कंबल दिए जा रहे हैं। उन्होंने भारत सरकार से अपील की कि सर्दियों के दौरान सक्रिय और समन्वित कदम उठाए जाएं जिनमें रैन बसेरों की संख्या बढ़ाना, गर्म कपड़ों का वितरण, गर्म भोजन की व्यवस्था, मोबाइल स्वास्थ्य इकाइयों की तैनाती और पूर्व चेतावनी प्रणालियों को मज़बूत करना शामिल है। उन्होंने नागरिकों से भी दान, स्वैच्छिक सेवा और सामुदायिक सहयोग के माध्यम से योगदान देने का आग्रह किया ताकि कड़ी सर्दी में कोई भी व्यक्ति असुरक्षित न रहे। मलिक मोअतसिम खान ने देश के विभिन्न हिस्सों में ईसाई समुदाय के खिलाफ बढ़ती लक्षित हिंसा और उत्पीड़न पर भी गहरी चिंता जताई। उन्होंने कहा, कि हम इस संकट की घड़ी में ईसाई समुदाय के साथ पूरी एकजुटता में खड़े हैं।”
उन्होंने चेतावनी दी कि प्रार्थना सभाओं में बाधा, दफन से जुड़े विवाद और धर्मांतरण विरोधी कानूनों के तहत लगाए जा रहे आरोप, यदि अनदेखे रहे, तो भय और अविश्वास का माहौल पैदा कर सकते हैं।मलिक मोअतसिम खान ने त्रिपुरा के एक युवा एमबीए छात्र एंजेल चकमा की नृशंस लिंचिंग की कड़े शब्दों में निंदा करते हुए इसे नस्लीय पूर्वाग्रह पर आधारित घृणा अपराध और पूर्वोत्तर के नागरिकों के खिलाफ लंबे समय से चले आ रहे भेदभाव और अलगाव का परिणाम” बताया। उन्होंने कहा कि ऐसे हमले समाज की विफलता और कानून व्यवस्था की कमजोरियों को उजागर करते हैं, जिससे असामाजिक तत्व खुद को बेखौफ समझने लगते हैं।कड़े कदम उठाने की मांग करते हुए JIH के उपाध्यक्ष ने उत्तराखंड सरकार से अपील की कि शीघ्र गिरफ्तारियां की जाएं, सबसे कठोर कानूनी धाराएं लगाई जाएं, पीड़ितों और गवाहों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए तथा न्याय और मुआवज़ा प्रदान किया जाए। उन्होंने कहा, कि सबसे बढ़कर, भारत को नस्लीय और घृणा-आधारित हिंसा के खिलाफ एक व्यापक राष्ट्रीय क़ानून की तत्काल आवश्यकता है। उन्होंने पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ के इस कथन की याद दिलाई कि किसी भी इंसान को दूसरे पर कोई श्रेष्ठता नहीं है, सिवाय धर्मपरायणता और कर्मों की श्रेष्ठता के, जो सार्वभौमिक मानवीय गरिमा और समानता की पुष्टि करता है।

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