36 साल बाद मायावती की बहुजन समाज पार्टी हुई संसद से बाहर : रिफ़ाक़त अली (उत्तर प्रदेश उपाध्यक्ष SDPI)

वर्ष 2026 में राज्यसभा में भी बहुजन समाज पार्टी का एक भी सांसद नहीं बचेगा

मेरठ (एशियन पत्रिका ब्यूरो)

कहते हैं कि जिसका ऊरूज होता है उसका ज़वाल भी निश्चित है इसलिए अपने कर्मों और गतिविधियों को सही रखना बहुत आवश्यक है। वक्त बिगड़ते या बदलते समय नहीं लगता। अगर हम बात करें,बहुजन समाज पार्टी (BSP) की तो उसने कभी पूरे उत्तर प्रदेश में दलित, वंचित और पिछड़े वर्गों की सशक्त आवाज़ बनकर देश की राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान हासिल किया था, आज वह गहरे राजनीतिक पतन के दौर से गुज़र रही है। मायावती के नेतृत्व में पार्टी का जनाधार लगातार सिमटता जा रहा है और विधानसभा से लेकर संसद तक उसकी मौजूदगी लगभग समाप्ति की ओर है।
राजनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण राज्य उत्तर प्रदेश में आज बहुजन समाज पार्टी के पास विधानसभा में केवल एक विधायक रह गया है, जबकि विधान परिषद में पार्टी का एक भी सदस्य नहीं है। यह स्थिति स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि पार्टी जनता का भरोसा खो चुकी है।
लोकसभा में पहले ही बीएसपी का प्रतिनिधित्व समाप्त हो चुका है और यदि मौजूदा हालात बने रहे तो वर्ष 2026 में राज्यसभा में भी बहुजन समाज पार्टी का एक भी सांसद नहीं बचेगा। इसके परिणामस्वरूप नवंबर 2026 के बाद संसद में बीएसपी की आवाज़ पूरी तरह खामोश हो जाएगी। किसी भी राष्ट्रीय पार्टी के लिए यह एक ऐतिहासिक और दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति होगी।
इस राजनीतिक पतन का एक बड़ा कारण मायावती की वह नीति रही है, जिसमें समय-समय पर भाजपा की राजनीति और उसके फैसलों के प्रति नरमी या परोक्ष समर्थन दिखाई दिया। जिस पार्टी ने कभी सांप्रदायिक राजनीति के खिलाफ संघर्ष का दावा किया था, आज उसी पार्टी की अस्पष्ट और समझौतावादी राजनीति ने उसके मूल समर्थकों को निराश कर दिया है।
राजनीति में उतार-चढ़ाव स्वाभाविक है, लेकिन जब नेतृत्व सामाजिक न्याय, जनहित और संवैधानिक मूल्यों से समझौता करता है, तो समय भी कठोर हो जाता है। बहुजन समाज पार्टी की वर्तमान स्थिति इसी सच्चाई को उजागर करती है।
आज आवश्यकता है कि देश के दलित, पिछड़े, अल्पसंख्यक और वंचित वर्ग सिद्धांतों पर आधारित, संघर्षशील और जनपक्षधर राजनीति को फिर से अपनाएं, न कि व्यक्तिवाद और अवसरवादी समझौतों को। सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) इसी वैकल्पिक राजनीति के साथ जनता के बीच मौजूद है, जो संविधान, सामाजिक न्याय और वास्तविक लोकतंत्र में विश्वास रखती है।
इतिहास गवाह है कि जो राजनीतिक दल अपने मूल सिद्धांतों से भटक जाते हैं, वे अंततः हाशिये पर चले जाते हैं।

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