डोमा के लोगों ने डॉ.अंबेडकर का मुखौटा पहनकर लिया संविधान बचाने का संकल्प।
पुलिस के कड़े प्रबंध, रोक-टोक और परमीशन न देने के बावजूद किया गया आयोजन


नई दिल्ली ( एशियन पत्रिका/अनवार अहमद नूर)
दलित, ओबीसी, माइनॉरिटीज और आदिवासी संगठनों का परिसंघ (डोमा परिसंघ) के द्वारा अंबेडकर भवन, रानी झांसी रोड, नई दिल्ली में बड़ी संख्या में लोगों ने डॉ अंबेडकर की प्रतिमा के समक्ष संविधान बचाने की कसम खाई। इन लोगों ने भीमराव डॉ. अंबेडकर का मुखौटा लगाकर संकल्प लिया। बताया गया कि रैली रामलीला मैदान में होनी थी लेकिन बीजेपी नेता की शिकायत पर एनओसी देने से इंकार कर दिया गया था इसलिए कार्यक्रम में परिवर्तन किया गया और सरकार की सख़्ती के उपरांत भी आज भी लोग रामलीला मैदान में पहुचें और उनके साथ पुलिस ने दुर्व्यवहार किया। उसके पश्चात अंबेडकर भवन में शांतिपूर्वक संकल्प लेने पहुंचे तो वहां भी भारी पुलिस की तैनाती रही और मार्च नहीं निकलने दिया गया।
डोमा के राष्ट्रीय चेयरमैन, डॉ उदितराज ने कहा है कि संविधान और जनतंत्र बचाना अब केवल राजनीतिक दलों के वश का नहीं रह गया है। तमाम संवैधानिक संस्थाएं कमज़ोर हो चुकीं हैं, जिन्हें कुछ ही लोग लड़कर सुरक्षित नहीं कर सकते। जन आंदोलन ही एकमात्र विकल्प है, अगर संविधान को बचाना है। अल्पसंख्यकों की धार्मिक आज़ादी लगभग छीन ली गई है। कदम-कदम पर मुस्लिम समाज के साथ भेदभाव हो रहा है। ईसाई समाज जब प्रार्थना करता है तो उस पर धर्मांतरण का आरोप लगाकर प्रताड़ित किया जाता है। वर्तमान हालत में मुस्लिम और ईसाई समाज से अन्य वंचित समाज जैसे- दलित, पिछड़ा और आदिवासी के साथ सामाजिक नेटवर्किंग करना ही एकमात्र विकल्प है, जिससे संविधान और लोकतंत्र की भी रक्षा हो सकेगी। डोमा एक सामाजिक और सांस्कृतिक संगठन है, फिर भी सत्ताधारी दल क्यों इतना डरा और सहमा है। पहले से निर्धारित कार्यक्रम को नहीं करने दिया और अंत तक पुलिस के द्वारा रुकावट पैदा की जाती रही। दिल्ली में चाहे जितनी बड़ी रैली या सम्मेलन हो उसका असर सीमित ही रहता है, इसलिए डोमा के साथी अंबेडकर का संदेश लेकर वापिस जाएं और गाँव, ब्लॉक और ज़िला तथा प्रदेश स्तर पर संगठन खड़ा करें ताकि सामाजिक न्याय और वैज्ञानिक सोच धरातल पर उतरे। यह कार्य शायद राजनैतिक दलों से बेहतर सामाजिक संगठन कर सकते हैं। जिस तरह से पाखंड और धर्मांधता सत्ताधारी दल के द्वारा प्रचारित किया जा रहा है, उससे विज्ञान और टेक्नोलॉजी का महत्व ख़त्म हो रहा है और हो जाएगा और देश फिर से गुलाम बनेगा। जिस किसी समाज में मीडिया और सत्ता खुद के स्वार्थ में धार्मिक कट्टरता, अंधविश्वास और पाखंड फैलाएं तो न वहाँ के लोगों का जीवन बेहतर हो सकता है और न ही आर्थिक स्थिति में सुधार।
यहां बड़ी संख्या में लोगों ने डॉ. अंबेडकर का मुखौटा पहनकर संकल्प लिया कि जिन मांगों को लेकर डोमा मैदान में हैं, हम उसे जन-जन तक लेकर जाएंगें। हमारी मुख्य मांगें – संविधान बचाना, आरक्षण की सीमा 50% से बढ़ाना, वोट चोरी को रोकना एवं बैलट पेपर से चुनाव, जाति जनगणना, वक़्फ़ बोर्ड में हस्तक्षेप को रोकना, निजीकरण पर रोक और उसमें आरक्षण, उच्च न्यायपालिका में आरक्षण, खाली पदों पर भर्ती, भूमि आवंटन, समान शिक्षा, ठेकेदारी प्रथा की समाप्ति, धार्मिक आज़ादी, सरकारी धन से चल रही परियोजनाओं में आरक्षण,किसानों को न्यूनतम मूल्य की गारंटी, आदिवासियों को जल, जंगल व जमीन से वंचित किए जाने से रोकने, पुरानी पेंशन की बहाली आदि हैं और इन पर अनवरत देशव्यापी अभियान और संघर्ष जारी रहेगा।







