राष्ट्रीय उर्दू परिषद द्वारा आयोजित हुईं ‘मेरा रचनात्मक सफ़र’ और ‘डिजिटल मीडिया : चुनौतियां और अवसर’ विषयों पर संगोष्ठियां
उर्दू पुस्तकों के डिजिटलीकरण की आवश्यकता पर बल दिया गया











नई दिल्ली (एशियन पत्रिका/अनवार अहमद नूर)
विश्व पुस्तक मेले में राष्ट्रीय उर्दू भाषा संवर्धन परिषद के स्टॉल पर दो महत्वपूर्ण साहित्यिक विषयों पर संगोष्ठियों का आयोजन किया गया। पहली संगोष्ठी ‘मेरा रचनात्मक सफ़र: लेखकों से मुलाक़ात’ शीर्षक से हुई, जिसमें प्रोफेसर तारिक छतारी, डॉ. खुर्शीद अक़रम और राजीव प्रकाश साहिर पैनलिस्ट के रूप में शामिल हुए, जबकि संगोष्ठी का संचालन मालिक अश्तर ने किया। प्रोफेसर तारिक छतारी ने अपने रचनात्मक सफ़र पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उनका पारिवारिक वातावरण शैक्षणिक था और घर में पुस्तकों की उपलब्धता ने बचपन से ही उन्हें अध्ययन की ओर प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि प्रारंभ से ही उनका मन रचनात्मक ढंग से सोचने का अभ्यस्त रहा, विभिन्न विषयों पर विचार आते रहे और इसी प्रक्रिया में संवाद उनके मन में आकार लेते गए। उन्होंने अपनी पहली कहानी की पृष्ठभूमि और प्रसिद्ध कथाकार सैयद मोहम्मद अशरफ़ द्वारा मिली हौसला-अफ़ज़ाई का भी रोचक उल्लेख किया। उनका कहना था कि सृजन एक सतत प्रक्रिया है, जो रचनाकार के मन में हर समय चलती रहती है। उन्होंने विज्ञान से उर्दू साहित्य की ओर अपने सफ़र और पत्रिकाओं में रचनाओं के प्रकाशन के अनुभव भी विस्तार से साझा किए।
डॉ. खुर्शीद अक़रम ने कहा कि कहानी उनका पहला प्रेम रही है। शुरुआत में वे पत्रिकाओं में कहानियाँ पढ़ते रहे और फिर स्वयं सृजन की ओर आकर्षित हुए। उन्होंने कहा कि हर रचना अपने उलझाव से निकलने का प्रयास करती है—यदि उसे सुंदर मार्ग मिल जाए तो वह फ़िक्शन बन जाती है और यदि सिरा न मिले तो कविता का रूप ले लेती है। उन्होंने बताया कि आरंभ में वे ग़ज़ल से प्रभावित थे, किंतु छंद और बहर की पाबंदियों ने उन्हें गद्य कविता की ओर मोड़ दिया। उनका कहना था कि रचना अचानक नहीं होती, बल्कि इसके लिए अनुकूल वातावरण, अच्छे मित्र और पर्याप्त अध्ययन अत्यंत आवश्यक है।
रचनाकार राजीव प्रकाश साहिर ने कहा कि उर्दू से प्रेम ने ही उनके भीतर के रचनाकार को जगाया। उन्होंने बताया कि उर्दू उन्हें विरासत में नहीं मिली, बल्कि उन्होंने मेहनत और लगन के साथ उर्दू भाषा और उसकी लिपि सीखी। उन्होंने कहा कि जीवन का गहन अवलोकन और लखनऊ का साहित्यिक वातावरण उनके रचनात्मक सफ़र में अत्यंत सहायक रहा। संगोष्ठी के अंत में तीनों रचनाकारों ने अपनी रचनाएं भी प्रस्तुत कीं, जिन्हें श्रोताओं ने खूब सराहा।
इससे पूर्व ‘डिजिटल मीडिया : चुनौतियाँ और अवसर’ विषय पर एक अन्य संगोष्ठी आयोजित हुई, जिसमें मोहम्मद नसीम नक़वी, अशरफ़ बस्तवी, डॉ. ख़ालिद रज़ा ख़ान और डॉ. शगुफ़्ता यासमीन पैनलिस्ट के रूप में शामिल हुए, जबकि संचालन डॉ. मसऊद अहमद ने किया।
मोहम्मद नसीम नक़वी ने कहा कि सोशल मीडिया तभी उपयोगी सिद्ध हो सकता है, जब उसका सकारात्मक और ज़िम्मेदाराना उपयोग किया जाए। उन्होंने समाचारों के प्रसारण में सत्यापन और सावधानी की आवश्यकता पर ज़ोर देते हुए कहा कि अन्यथा डिजिटल मीडिया के नुकसान अधिक हो सकते हैं। अशरफ़ बस्तवी ने कहा कि डिजिटल मीडिया ने आम लोगों को अभिव्यक्ति का मंच दिया है, किंतु झूठी ख़बरों से सतर्क रहना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने अभिभावकों से आग्रह किया कि वे डिजिटल युग में बच्चों का सही मार्गदर्शन करें।
डॉ. ख़ालिद रज़ा ख़ान ने कहा कि डिजिटल मीडिया ने सूचनाओं तक पहुँच को सरल बनाया है, लेकिन इसके साथ ध्यान भटकने और समय की बर्बादी का ख़तरा भी है। उन्होंने उर्दू पुस्तकों के डिजिटलीकरण की आवश्यकता पर बल दिया। डॉ. शगुफ़्ता यासमीन ने कहा कि सोशल मीडिया ने आम इंसान की आवाज़ को दूर तक पहुँचाया है, लेकिन बच्चों और युवाओं को इसके अत्यधिक उपयोग और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के नकारात्मक प्रभावों से बचाना भी उतना ही आवश्यक है।







