बज़्म-ए-सुख़न स्योहारा का ऑल इंडिया ऑनलाइन तरही मुशायरा पूरी शान, बान और वक़ार के साथ संपन्न

मुशायरा अहल-ए-सुख़न और अहल-ए-ज़ौक़ के दिलों पर शानदार असर छोड़ने में कामयाब।

स्योहारा (बिजनौर यूपी)(अनवार अहमद नूर की रिपोर्ट)

बज़्म-ए-सुख़न स्योहारा (अल-हिन्द) ने यादगार हिलाल और दिल-ए-सीवहारवी की अदबी व तहज़ीबी रिवायत को बरक़रार रखते हुए तैंतालीसवाँ ऑल इंडिया ऑनलाइन तरही मुशायरा दिनांक 6 नवम्बर 2025 दिन गुरुवार को बहुत ही शान, वक़ार के साथ आयोजित किया गया। यह मुशायरा अहल-ए-सुख़न और अहल-ए-ज़ौक़ के दिलों पर शानदार असर छोड़ने में कामयाब रहा। मुशायरे की अध्यक्षता (सदारत) खैराबाद के मशहूर शायर जनाब महबूब खैराबादी ने फ़रमाई। जबकि निज़ामत के फ़राइज़ ग़ोहर हिलाल सीवहारवी ने अंजाम दिए। मेहमान-ए-एज़ाज़ी में क़ारी नौशाद आलम शाद अलीग (धामपुरी), क़मर खैराबादी, अनवारुल हक़ शादां फरीदी रहे। जबकि मेहमान-ए-ख़ास के तौर पर मौलाना सिराजुद्दीन रहबर क़ासमी, मौलाना बशीर अहमद मज़ाहिरी, ज़फ़र हुसैन मुरादाबादी, ने शिरकत फ़रमाई। ये मुशायरा मास्टर आरिफ़ नियाज़ चाँदपुरी,क़ारी राशिद हमीदी धामपुरी की ज़ेरे सरपरस्ती में हुआ। जबकि इसके निग़रॉ मुफ़्ती कफ़ील अतहर सीवहारवी और
क़ारी अब्दुल क़ादिर हसरत हबीबवाला रहे।
तरही मिसरा:
“बोलने से डरते हैं अब ज़बान वाले भी”
क़ाफ़िया: ज़बान, मकान, जहाँ…
रदीफ़: वाले भी
बहर: फ़ाइलन मफ़ाईलुन फ़ाइलन मफ़ाईलुन
मुशायरे में शरीक शायरों के अस्मा-ए-गरामी
(नाम)ये हैं – शनावर किरतपुरी, सब्तैन परवाना, घायल खैराबादी,ज़ियाउद्दीन ज़िया खैराबादी, अमीन अब्दुस्सत्तार साहिल,अशफ़ाक़ अली गुलशन खैराबादी,हाफ़िज़ मसऊद महमूदाबादी,मौलाना अतहर कमलापुरी (सीतापुर), डॉ. आफ़ताब नौमानी (नजीबाबाद), ज़ीशान ज़िया कबीरनगरी,मोहम्मद साबिर गढ़ी (कांठ),हुदैफ़ा खालिद उस्मानी (मालेगांव),
एडवोकेट इक़बाल मुद्हवी (हमीरपुर),रईस अहमद राज़ नगीनवी,सरवत दानापुरवी (कटिहार), मिज़ाज़ुल हक़ मिज़ाज़ सुलतानपूरी, हकीम असरारुल हक़ क़ासमी नूरपुरी,मुर्सलीन माहिर मेरठी,जनाब शाद फ़रीदी नहटौरी, मौलाना मोहम्मद रिज़वान क़ासमी स्योहारा, मुफ़्ती इफ्तिखारुल हसन “हसन धामपुरी”,अली अक़रम नूरपुरी,आलिया गोहर करीमनगर (तेलंगाना), चमन कलीम दरभंगा (बिहार),क़ारी राशिद हमीदी धामपुरी।
मुशायरे के समाप्ति पर इस बात पर ख़ास तौर पर ज़ोर दिया गया कि उर्दू केवल एक भाषा नहीं, बल्कि एक तहज़ीब, एक एहसास, एक नैतिक नज़ाकत और एक जीवित रिवायत है।
इसकी हिफ़ाज़त हम सब की सामूहिक ज़िम्मेदारी है। अगर हम अपनी बातचीत में उर्दू का सलीक़ा ज़िंदा रखें, बच्चों में इसका ज़ौक़ पैदा करें और साहित्यिक महफ़िलों व मुशायरों को जारी रखें, तो उर्दू कभी भी ज़वाल का शिकार नहीं होगी। मजलिस-ए-शूरा, बज़्म-ए-सुख़न स्योहारा ने सभी शायरों और अहल-ए-ज़ौक़ हज़रात का शुक्रिया अदा करते हुए इस सिलसिले को और अधिक वसीअ (विस्तृत) करने के इरादे का इज़हार किया।

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